समाचार एजेंसी तसनीम ने समाचार पत्र रायुल यौम के हवाले से रिपोर्ट दी है कि, सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ने फ़ार्स की ख़ाड़ी के अरब देशों के बीच संकट के समाधान और क़तर के साथ सऊदी अरब के संबंधों में पाए जाने वाले संकट की समाप्ति के बारे में बोलते हुए बताया है कि दोनों देशों के बीच अंतिम सहमति हो गई है। सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने एलान किया कि, इस मामले में शामिल सभी पक्ष अंतिम समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब इस मामले में शामिल सभी पक्षो के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और हमारे पास सकारात्मक मूल्यांकन है। लेकिन सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ऐसी स्थिति में कह रहे हैं कि इस मामले से जुड़े सभी पक्ष अंतिम समाधान की ओर बढ़ रहे हैं कि जब, मिस्र, संयुक्त अरब इमारात और बहरैन ने अभी तक इस बारे में किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। साथ ही अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के दामाद और सलाहकार जेरेड कूश्नर, कि जिनके बारे में कहा जा रहा है कि, उन्होंने फ़ार्स की खाड़ी के अरब देशों के बीच जारी संकट के समाधान के लिए ही पश्चिमी एशिया की यात्री की है। उन्होंने अपनी हालिया यात्रा में केवल क़तर और सऊदी अरब का ही दौरा किया है। जबकि इस मामले के अन्य पक्षों से इस मामले को लेकर अभी उनकी किसी भी तरह की कोई वार्ता नहीं हुई है। वहीं फ़ार्स की खाड़ी के अरब देशों के बीच जारी संकट के हल की ख़बरों के बारे में जो चीज़ संदेह पैदा कर रही है वह यह है कि, अभी तक न जेरेड कूश्नर और न ही सऊदी अरब एवं क़तर की ओर से इस तरह का स्पष्ट बयान आया है कि तीन वर्षों से जारी फ़ार्स की खाड़ी के अरब देशों के बीच कोई अंतिम सहमति बन गई है।

वास्तव में अब तक सुलह की जो बातें क़तर की घेराबंदी करने वाले देशों की ओर से सुनी जा रही हैं वह उन देशों की ओर से है कि जिनका क़तर के साथ कोई विवाद नहीं है। जैसे कुवैत ने सबसे पहले फ़ार्स की खाड़ी के अरब देशों के बीच जारी विवाद की समाप्ति की ख़बर देते हुए उसका भरपूर स्वागत किया है। लेकिन सवाल यह है कि वह किस चीज़ का स्वागत कर रहे हैं? यह सही है कि पिछले तीन दिनों से इस संकट के हल के लिए किए जा रहे प्रयासों में आई तेज़ी के बाद सऊदी अरब और क़तर की मीडिया ने एक दूसरे के लिए अब भड़काउ बयान देना बंद कर दिया है, ऐसे जैसे युद्धविराम की घोषणा कर दी गई हो। लेकिन जानकारों का कहना है कि रियाज़ और दोहा के बीच अबतक किसी भी स्तर का कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क देखने को नहीं मिला है और न ही मिस्र, बहरैन और संयुक्त अरब इमारात के बीच इस तरह का कोई संपर्क देखने को मिला है। इस बारे में अमेरिका के एनबीसी टीवी चैनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि, सऊदी अरब और क़तर के बीच उस समय सहमति और सुलह होना संभव है कि जब सऊदी अरब अपनी हवाई सीमा को क़तर की कमर्शियल फ्लाइटों के लिए खोल दे और इसके बदले में क़तर द्वारा रियाज़ के इस क़दम की अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय अदालतों में की गई शिकायत को वापस ले लिया जाए। हो सकता है कि अमेरिका के इस चैनल की रिपोर्ट एक हद तक सही हो। क्योंकि तीन वर्षों से चला आ रहा यह विवाद, कि जिसके बारे में दोनों पक्षों की मीडिया ने एक जंग छेड़ रखी थी और उसको बहुत ज़्यादा जटिल बना दिया था, अचानक से उसके हल हो जाने के एलान ने कई निरुत्तर सवालों को पीछे छोड़ दिया है।

दूसरी ओर सऊदी अरब, मिस्र, बहरैन और संयुक्त अरब इमारात ने जब क़तर की घेराबंदी की तो उसको समाप्त करने के लिए उन्होंने 13 शर्तें लगाईं थीं। उन शर्तों में मुख्य शर्तें यह थीं कि, क़तर अलजज़ीरा चैनल के साथ-साथ कई समाचार एवं शोध केंद्रों को बंद करे, तुर्की के सैन्य अड्डे को बंद करे और ईरान के साथ अपने संबंधों के कम करे। अब सबसे अहम सवाल यह पैदा होता है कि, क्या यह सभी शर्तों का पूरा होना संभव है, जबकि क़तर इन शर्तों को देश की संप्रभूता के ख़िलाफ़ मानता है। फ़ार्स की खाड़ी के अरब देशों के संकट के बारे में एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु इस सुलह का सटीक समय है और इसके परिणामस्वरूप सामने आने वाले राजनीतिक, सैन्य, सामाजिक और आर्थिक उपाय हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि यह सुलह प्रक्रिया जो क़तर की घेराबंदी करने वाले सऊदी अरब और अन्य तीन देशों के बीच आरंभ हुई है वह अरब देशों के साथ बनाए जा रहे गठबंधन के ढांचे के अंदर हो। जिस गठबंधन को ट्रम्प सरकार ज़ायोनी शासन की योजनाओं को लागू करने और ईरान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना चाहती है। कुछ अन्य का यह मानना है कि हो सकता है यह सुलह प्रक्रिया फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद की ज़ायोनी शासन के साथ सहयोग के लिए शुरू की गई हो। लेकिन क़तर के उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुर्रहमान बिन जासिम आले सानी ने इन सभी संभावनाओं को खारिज करते हुए जेरेड कूश्नर के दोहा छोड़ने के बाद दिए अपने बयान में कहा है कि, इस सुलह प्रक्रिया का ज़ायोनी शासन के साथ स्थापित होने वाले संबंधों और उसके साथ होने वाले समझौतों से कोई लेना-देना नहीं है।

कुल मिलाकर ट्रम्प जो व्हाइट हाउस में अपने अंतिम दिन गिन रहे हैं, वह चाहते हैं कि फ़ार्स की खाड़ी के देशों को अपने अंतिम दिनों में अपनी पुरानी डराने और धमकाने वाली नीति के तहत उनको अपने मनमाने फ़ैसलों के लिए राज़ी कर लें और साथ ही उनसे जाते-जाते कुछ पैसे वसूल कर लें। लेकिन ऐसा लगता है कि वह अपनी मनमानी नीति को मिस्र पर थोपने में सक्षम नहीं है। इसलिए जानकारों का मानना है कि, अरब देशों के बीच सुलह प्रक्रिया में मिस्र की भूमिका सबसे अहम और निर्णनायक होगी। यह ऐसी स्थिति में है कि जब हाल ही में मिस्र की संसद में राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा समिति के सदस्य तामर शहावी ने एक दिन पहले क़तर के साथ विवाद को हल करने के लिए की जा रही कोशिशों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि, क़तर कभी भी फ़ार्स के खाड़ी के अरब देशों की शर्तों को स्वीकार नहीं करेगा।